Bihar Board Class 7 Geography Chapter 3 Solutions – आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

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बिहार बोर्ड की सातवीं कक्षा की भूगोल की किताब का तीसरा अध्याय “आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ” हमें पृथ्वी की सतह पर उभरी विभिन्न आकृतियों के बारे में समझने में मदद करेगा। इस अध्याय में हम जानेंगे कि धरती के अंदर के बलों से ये भू-आकृतियां कैसे बनती हैं। चाहे वह पहाड़, पर्वत श्रेणियां हों या फिर घाटियां और मैदान, इन सबका निर्माण आंतरिक बलों की क्रिया से ही होता है। हम अलग-अलग भू-आकृतियों के बनने के तरीकों और उनकी विशेषताओं को समझेंगे।

Bihar Board Class 7 Geography Chapter 3

Bihar Board Class 7 Geography Chapter 3 Solutions

SubjectGeography (हमारी दुनिया भाग 2)
Class7th
Chapter3. आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ
BoardBihar Board

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न (क) भूकंप के झटके क्यों आते हैं?

उत्तर: भूकंप के झटके तब आते हैं जब पृथ्वी के अंदर स्थित प्लेट्स एक-दूसरे से टकराती हैं या फिसलती हैं। ये प्लेट्स पृथ्वी के कठोर बाह्य परत और नरम भीतरी परत के बीच स्थित होती हैं। जब ये प्लेट्स एक-दूसरे से टकराती हैं या फिसलती हैं, तो इससे प्रचंड ऊर्जा का विमोचन होता है, जिसके कारण पृथ्वी के ऊपर झटके महसूस होते हैं। इन झटकों की तीव्रता और स्थिति के आधार पर भूकंप की तीव्रता और केन्द्र का निर्धारण होता है।

प्रश्न (ख) भूकम्प का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर: भूकंप का मानव जीवन पर बहुत घातक प्रभाव पड़ता है। भूकंप से निर्मित विध्वंस से कई लोगों की मृत्यु हो जाती है। भूकंप से घरों, इमारतों, पुलों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचता है, जिससे लोगों को बेघर होना पड़ता है। साथ ही, भूकंप से बिजली, पानी, संचार व्यवस्था आदि बुनियादी सुविधाओं में बाधा उत्पन्न हो जाती है। भूकंप के बाद आने वाले बाढ़ और भूस्खलन से भी काफी नुकसान होता है। इन सब कारणों से भूकंप के बाद लोगों को विस्थापित होना पड़ता है और उनके जीवन में व्यवधान आ जाता है।

प्रश्न (ग) ज्वालामुखी किसे कहते हैं?

उत्तर: ज्वालामुखी वह स्थान है जहां पृथ्वी की सतह पर से गर्म लावा, धुएं, गैसें या राख बाहर निकलती है। ये पृथ्वी की भीतरी परतों में मौजूद गर्म लावा और गैर है जो किसी कारण से पृथ्वी की सतह पर बाहर आ जाता है। ज्वालामुखी का निर्माण तब होता है जब पृथ्वी की आंतरिक गर्मी और दबाव के कारण लावा बाहर फूट निकलता है। इन ज्वालामुखियों के चारों ओर एक पर्वत बन जाता है, जिसे ज्वालामुखी पर्वत कहा जाता है।

प्रश्न (घ) ज्वालामुखी ने मानव जीवन को प्रभावित किया है, कैसे?

उत्तर: ज्वालामुखियों का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। एक ओर, ज्वालामुखियों से निकलने वाले लावे ने कई बार मनुष्यों, उनके घरों, खेतों और बागों को नष्ट कर दिया है। लावा के प्रवाह से बहुत से लोगों की मृत्यु हो गई है। वहीं, दूसरी ओर, ज्वालामुखियों से निकलने वाले राख और अन्य पोषक तत्वों से मिट्टी में उर्वरता बढ़ गई है। इससे उपजाऊ भूमि बन गई है, जिससे कृषि गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। इस प्रकार ज्वालामुखियों ने मानव जीवन को नुकसान पहुंचाया भी है और लाभ भी पहुंचाया है।

प्रश्न (ङ) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणाम स्वरूप निर्मित होनेवाली स्थलाकृतियाँ कौन-कौन सी हैं? वर्णन कीजिए।

उत्तर: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणामस्वरूप कई प्रकार की स्थलाकृतियां निर्मित होती हैं। प्रमुख स्थलाकृतियां निम्नलिखित हैं:

  • ज्वालामुखी पर्वत: ये पर्वत तब बनते हैं जब पृथ्वी की आंतरिक गर्मी और दबाव के कारण लावा बाहर फूट निकलता है और ठंडा होकर पर्वत बना देता है।
  • पर्वत: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण कई स्थानों पर पर्वत उठ जाते हैं। ये पर्वत कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे, विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, छोटे पर्वत, पठार आदि।
  • घाटी: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण कई स्थानों पर घाटियां बन जाती हैं। ये घाटियां नदियों के प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
  • पठार: पृथ्वी की आंतरिक गतिविधियों के कारण कई स्थानों पर समतल पठार भी बन जाते हैं, जो कृषि गतिविधियों के लिए उपयुक्त होते हैं।

इस प्रकार पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियां निर्मित होती हैं।

प्रश्न (च) मोड़दार एवं संचयन पर्वतों में क्या भिन्नता है एवं क्या समानता है?

उत्तर: मोड़दार और संचयन पर्वतों में निम्नलिखित प्रमुख भिन्नताएं हैं:

  • उत्पत्ति: मोड़दार पर्वत धरातलीय दबाव के कारण चट्टानों के मोड़ पड़ने से बनते हैं, जबकि संचयन पर्वत ज्वालामुखियों से निकले लावे के ठंडा होकर संचित होने से बनते हैं।
  • ऊंचाई: मोड़दार पर्वत आमतौर पर बहुत ऊंचे होते हैं, जिस कारण उनकी चोटियों पर बर्फ जमती है। संचयन पर्वत इतने ऊंचे नहीं होते, इसलिए उनकी चोटियों पर बर्फ नहीं जमती।
  • संरचना: मोड़दार पर्वतों की संरचना अनियमित और अस्पष्ट होती है, जबकि संचयन पर्वत नियमित ढलान और सममित संरचना वाले होते हैं।
  • समानता: दोनों ही प्रकार के पर्वत ऊंचे होते हैं और पर्वत श्रृंखलाओं का हिस्सा होते हैं।

प्रश्न (छ) पर्वत और पठार में क्या अंतर है?

उत्तर: पर्वत और पठार में निम्नलिखित प्रमुख अंतर हैं:

  • ऊंचाई: पर्वत धीरे-धीरे बढ़ते हुए बहुत ऊंचे होते हैं, जबकि पठार की ऊंचाई अचानक बढ़ जाती है और ऊपर समतल भाग होता है।
  • चोटी: पर्वतों की चोटियां अनियमित और अस्पष्ट होती हैं, जबकि पठारों की चोटियां समतल और नियमित होती हैं।
  • जलवायु: पर्वतों पर ठंडी जलवायु होती है और बर्फ जमती है, जबकि पठारों पर मध्यम जलवायु होती है और बर्फ नहीं जमती।
  • संसाधन: पर्वतों पर जलस्रोत और वन-संपदा होती है, जबकि पठारों पर खनिज संसाधन मिलते हैं।

इस प्रकार पर्वत और पठार की उत्पत्ति, संरचना, जलवायु और संसाधनों में अंतर होता है।

प्रश्न (ज) पर्वत के प्रकारों का उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।

उत्तर: पर्वत के चार प्रमुख प्रकार हैं, जिनका वर्णन एवं उदाहरण इस प्रकार हैं:

  • वलित पर्वत (Fold Mountains): जब धरातलीय दबाव के कारण चट्टानें मोड़ दी जाती हैं, तो वलित पर्वत बनते हैं। उदाहरण – हिमालय पर्वत (एशिया) और रॉकी पर्वत (उत्तर अमेरिका)।
  • भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains): जब धरातल पर भ्रंश (दरार) पड़ जाती है और बीच का भाग ऊपर उठ जाता है, तो भ्रंशोत्थ पर्वत बनते हैं। उदाहरण – विन्ध्याचल पर्वत (भारत) और ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत (यूरोप)।
  • संचयन पर्वत (Volcanic Mountains): जब ज्वालामुखियों से निकले लावे ठंडा होकर संचित होते हैं, तो संचयन पर्वत बनते हैं। उदाहरण – फ्यूजियामा पर्वत (जापान) और किलोमंजारो पर्वत (अफ्रीका)।
  • अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains): जब हवा, बारिश और अपरदन की शक्तियों द्वारा पर्वतों की चोटियों का क्षरण होता है, तो अवशिष्ट पर्वत बनते हैं। उदाहरण – अरावली पर्वत (भारत) और पूर्वी घाट (भारत)।

इस प्रकार पर्वतों के विभिन्न प्रकारों को उदाहरण सहित समझा जा सकता है।

प्रश्न (झ) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के क्या-क्या प्रभाव नजर आते हैं?

उत्तर: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के निम्नलिखित प्रभाव नजर आते हैं:

  • भूकंप: जब पृथ्वी की अंतर्गत प्लेटों में गतिविधि होती है, तो भूकंप के झटके महसूस होते हैं।
  • ज्वालामुखी: पृथ्वी की गर्म आंतरिक परतों से निकलने वाले मैग्मा और लावा ज्वालामुखियों का निर्माण करते हैं।
  • पर्वतों का निर्माण: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण विभिन्न प्रकार के पर्वत जैसे वलित, भ्रंशोत्थ, संचयन और अवशिष्ट पर्वत बनते हैं।

इन प्रमुख प्रभावों के अलावा, पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों का प्रभाव भूमिगत जलस्रोतों, खनिज संसाधनों और भूमि के रूपांतरण में भी देखा जा सकता है।

प्रश्न (ज) भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान कब एवं कहाँ होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान निम्नलिखित परिस्थितियों में होता है:

  • घनी आबादी वाले क्षेत्रों में: जहां लोगों का घनत्व ज्यादा होता है, वहां भूकम्प के कारण अधिक जनहानि और संपत्ति का नुकसान होता है।
  • भूकम्परोधी संरचनाएं नहीं होने पर: जहां मकान, सड़कें, पुल आदि भूकम्परोधी तरीके से नहीं बने होते, वहां बड़ा नुकसान होता है।
  • तटीय क्षेत्रों में: समुद्र तट के पास स्थित क्षेत्रों में भूकम्प के बाद आने वाली सुनामी से अधिक नुकसान होता है।
  • आर्थिक रूप से कमज़ोर क्षेत्रों में: जहां लोगों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है, वहां भूकम्प के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण की समस्या होती है।

इस प्रकार भूकम्प के कारण होने वाला नुकसान उन क्षेत्रों में अधिक होता है जहां लोग लापरवाह हैं या आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं।

प्रश्न (ट) भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम कैसे बच सकते हैं?

उत्तर: भूकम्प से होनेवाली क्षति से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

  • भूकम्परोधी संरचनाएं: मकान, सड़कें, पुल आदि को भूकम्प प्रतिरोधी तरीके से बनाना चाहिए।
  • जागरूकता और तैयारी: लोगों को भूकम्प से बचाव के उपायों और आपातकालीन प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
  • भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली: भूकम्प आने से पहले चेतावनी देने वाली प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए।
  • आपातकालीन प्रतिक्रिया: भूकम्प के बाद तुरंत बचाव और राहत कार्य करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • बीमा कवरेज: भूकम्प से होने वाले नुकसान के लिए बीमा कवरेज की व्यवस्था होनी चाहिए।

इन उपायों को अपनाकर भूकम्प से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है।

प्रश्न (ठ) पठार कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर: पठार निम्नलिखित छह प्रकार के होते हैं:

  • महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau): जैसे- दक्षिण अफ्रीका का कैप पठार।
  • वायूढ़ निक्षेप पठार (Depositional Plateau): जैसे- पश्चिमी यूपी का बुंदेलखंड पठार।
  • हिमनदीय निक्षेपण पठार (Glacial Depositional Plateau): जैसे- टिब्बत का पठार।
  • लावा निर्मित पठार (Volcanic Plateau): जैसे- दक्षिण अमेरिका का हाईलैंड्स पठार।
  • अंतरपर्वतीय पठार (Intermontane Plateau): जैसे- नेपाल का तराई पठार।
  • गिरिपद पठार (Piedmont Plateau): जैसे- भारत का बुंदेलखंड पठार।

इस प्रकार पठारों के विभिन्न प्रकार हैं, जो उनकी उत्पत्ति और स्थान के आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं।

प्रश्न (च) मोड़दार एवं संचयन पर्वतों में क्या भिन्नता है एवं क्या समानता है?

उत्तर: मोड़दार और संचयन पर्वतों में निम्नलिखित प्रमुख भिन्नताएं हैं:

  • उत्पत्ति: मोड़दार पर्वत धरातलीय दबाव के कारण चट्टानों के मोड़ पड़ने से बनते हैं, जबकि संचयन पर्वत ज्वालामुखियों से निकले लावे के ठंडा होकर संचित होने से बनते हैं।
  • ऊंचाई: मोड़दार पर्वत आमतौर पर बहुत ऊंचे होते हैं, जिस कारण उनकी चोटियों पर बर्फ जमती है। संचयन पर्वत इतने ऊंचे नहीं होते, इसलिए उनकी चोटियों पर बर्फ नहीं जमती।
  • संरचना: मोड़दार पर्वतों की संरचना अनियमित और अस्पष्ट होती है, जबकि संचयन पर्वत नियमित ढलान और सममित संरचना वाले होते हैं।
  • समानता: दोनों ही प्रकार के पर्वत ऊंचे होते हैं और पर्वत श्रृंखलाओं का हिस्सा होते हैं।

प्रश्न (छ) पर्वत और पठार में क्या अंतर है?

उत्तर: पर्वत और पठार में निम्नलिखित प्रमुख अंतर हैं:

  • ऊंचाई: पर्वत धीरे-धीरे बढ़ते हुए बहुत ऊंचे होते हैं, जबकि पठार की ऊंचाई अचानक बढ़ जाती है और ऊपर समतल भाग होता है।
  • चोटी: पर्वतों की चोटियां अनियमित और अस्पष्ट होती हैं, जबकि पठारों की चोटियां समतल और नियमित होती हैं।
  • जलवायु: पर्वतों पर ठंडी जलवायु होती है और बर्फ जमती है, जबकि पठारों पर मध्यम जलवायु होती है और बर्फ नहीं जमती।
  • संसाधन: पर्वतों पर जलस्रोत और वन-संपदा होती है, जबकि पठारों पर खनिज संसाधन मिलते हैं।

इस प्रकार पर्वत और पठार की उत्पत्ति, संरचना, जलवायु और संसाधनों में अंतर होता है।

प्रश्न (ज) पर्वत के प्रकारों का उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।

उत्तर: पर्वत के चार प्रमुख प्रकार हैं, जिनका वर्णन एवं उदाहरण इस प्रकार हैं:

  • वलित पर्वत (Fold Mountains): जब धरातलीय दबाव के कारण चट्टानें मोड़ दी जाती हैं, तो वलित पर्वत बनते हैं। उदाहरण – हिमालय पर्वत (एशिया) और रॉकी पर्वत (उत्तर अमेरिका)।
  • भ्रंशोत्थ पर्वत (Block Mountains): जब धरातल पर भ्रंश (दरार) पड़ जाती है और बीच का भाग ऊपर उठ जाता है, तो भ्रंशोत्थ पर्वत बनते हैं। उदाहरण – विन्ध्याचल पर्वत (भारत) और ब्लैक फॉरेस्ट पर्वत (यूरोप)।
  • संचयन पर्वत (Volcanic Mountains): जब ज्वालामुखियों से निकले लावे ठंडा होकर संचित होते हैं, तो संचयन पर्वत बनते हैं। उदाहरण – फ्यूजियामा पर्वत (जापान) और किलोमंजारो पर्वत (अफ्रीका)।
  • अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains): जब हवा, बारिश और अपरदन की शक्तियों द्वारा पर्वतों की चोटियों का क्षरण होता है, तो अवशिष्ट पर्वत बनते हैं। उदाहरण – अरावली पर्वत (भारत) और पूर्वी घाट (भारत)।

इस प्रकार पर्वतों के विभिन्न प्रकारों को उदाहरण सहित समझा जा सकता है।

प्रश्न (झ) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के क्या-क्या प्रभाव नजर आते हैं?

उत्तर: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के निम्नलिखित प्रभाव नजर आते हैं:

  • भूकंप: जब पृथ्वी की अंतर्गत प्लेटों में गतिविधि होती है, तो भूकंप के झटके महसूस होते हैं।
  • ज्वालामुखी: पृथ्वी की गर्म आंतरिक परतों से निकलने वाले मैग्मा और लावा ज्वालामुखियों का निर्माण करते हैं।
  • पर्वतों का निर्माण: पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के कारण विभिन्न प्रकार के पर्वत जैसे वलित, भ्रंशोत्थ, संचयन और अवशिष्ट पर्वत बनते हैं।

इन प्रमुख प्रभावों के अलावा, पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों का प्रभाव भूमिगत जलस्रोतों, खनिज संसाधनों और भूमि के रूपांतरण में भी देखा जा सकता है।

प्रश्न (ज) भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान कब एवं कहाँ होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान निम्नलिखित परिस्थितियों में होता है:

  • घनी आबादी वाले क्षेत्रों में: जहां लोगों का घनत्व ज्यादा होता है, वहां भूकम्प के कारण अधिक जनहानि और संपत्ति का नुकसान होता है।
  • भूकम्परोधी संरचनाएं नहीं होने पर: जहां मकान, सड़कें, पुल आदि भूकम्परोधी तरीके से नहीं बने होते, वहां बड़ा नुकसान होता है।
  • तटीय क्षेत्रों में: समुद्र तट के पास स्थित क्षेत्रों में भूकम्प के बाद आने वाली सुनामी से अधिक नुकसान होता है।
  • आर्थिक रूप से कमज़ोर क्षेत्रों में: जहां लोगों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है, वहां भूकम्प के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण की समस्या होती है।

इस प्रकार भूकम्प के कारण होने वाला नुकसान उन क्षेत्रों में अधिक होता है जहां लोग लापरवाह हैं या आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं।

प्रश्न (ट) भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम कैसे बच सकते हैं?

उत्तर: भूकम्प से होनेवाली क्षति से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

  • भूकम्परोधी संरचनाएं: मकान, सड़कें, पुल आदि को भूकम्प प्रतिरोधी तरीके से बनाना चाहिए।
  • जागरूकता और तैयारी: लोगों को भूकम्प से बचाव के उपायों और आपातकालीन प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
  • भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली: भूकम्प आने से पहले चेतावनी देने वाली प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए।
  • आपातकालीन प्रतिक्रिया: भूकम्प के बाद तुरंत बचाव और राहत कार्य करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • बीमा कवरेज: भूकम्प से होने वाले नुकसान के लिए बीमा कवरेज की व्यवस्था होनी चाहिए।

इन उपायों को अपनाकर भूकम्प से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है।

प्रश्न (ठ)पठार कितने प्रकार के होते हैं?

उत्तर: पठार निम्नलिखित छह प्रकार के होते हैं:

  • महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau): जैसे- दक्षिण अफ्रीका का कैप पठार।
  • वायूढ़ निक्षेप पठार (Depositional Plateau): जैसे- पश्चिमी यूपी का बुंदेलखंड पठार।
  • हिमनदीय निक्षेपण पठार (Glacial Depositional Plateau): जैसे- टिब्बत का पठार।
  • लावा निर्मित पठार (Volcanic Plateau): जैसे- दक्षिण अमेरिका का हाईलैंड्स पठार।
  • अंतरपर्वतीय पठार (Intermontane Plateau): जैसे- नेपाल का तराई पठार।
  • गिरिपद पठार (Piedmont Plateau): जैसे- भारत का बुंदेलखंड पठार।

इस प्रकार पठारों के विभिन्न प्रकार हैं, जो उनकी उत्पत्ति और स्थान के आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए :

अधिकेन्द्र: अधिकेन्द्र वह स्थान होता है जो भूकंप के उद्गम केन्द्र के ठीक ऊपर स्थित होता है। भूकंप का सबसे अधिक प्रभाव अधिकेन्द्र के आस-पास होता है और इससे दूर होते-होते प्रभाव कम होता जाता है। अधिकेन्द्र पर भूकंप के झटके सबसे अधिक महसूस किए जाते हैं।

उद्गम केन्द्र: उद्गम केन्द्र वह स्थान होता है जहां से भूकंप का प्रारंभ होता है। यह पृथ्वी की अंदर स्थित होता है। भूकंप की लहरें इस उद्गम केन्द्र से शुरू होकर सतह पर फैलती हैं। उद्गम केन्द्र और अधिकेन्द्र एक-दूसरे के ठीक सामने होते हैं।

सिस्मोग्राफ: सिस्मोग्राफ एक यंत्र होता है जो भूकंप की तीव्रता को मापता है। यह यंत्र भूकंप की लहरों का रिकॉर्ड करके उनकी तीव्रता का अनुमान लगाता है। सिस्मोग्राफ में रिक्टर पैमाना का उपयोग किया जाता है।

रिक्टर स्केल: रिक्टर स्केल भूकंप की तीव्रता को मापने का एक पैमाना है। यह स्केल 0 से 10 तक की होती है, जहां 0 का अर्थ है ‘कोई भूकंप नहीं’ और 10 का अर्थ है ‘सबसे अधिक तीव्र भूकंप’। सिस्मोग्राफ द्वारा भूकंप की तीव्रता का अनुमान रिक्टर स्केल पर लगाया जाता है।

प्रश्न 3.

(क) भूकम्प एवं ज्वालामुखी से सम्बंधित खबरों एवं चित्रों का संकलन कीजिए और मानव जीवन पर इनके प्रभाव से सम्बंधि त एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

(ख) अपने आस-पास के पर्वतों का अवलोकन कर उनका नाम पता कीजिए तथा लिखिये कि ये किस प्रकार के पर्वत हैं ।

(ग) भारत के मानचित्र पर भूकम्प के विभिन्न क्षेत्रों को अलग-अलग रंगों में दर्शाइए एवं कक्षा में प्रदर्शित कीजिए । भूकम्प के क्षेत्रों को घेर दिया गया है।

उत्तर:

(क) भूकंप और ज्वालामुखी से सम्बन्धित खबरों और चित्रों का संकलन कर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इसमें भूकंप और ज्वालामुखी के कारणों, प्रकारों और इनके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत वर्णन करें।

(ख) अपने आस-पास के पर्वतों का अवलोकन कर उनका नाम लिखें और बताएं कि ये किस प्रकार के पर्वत हैं – वलित, भ्रंशोत्थ, संचयन या अवशिष्ट। उनकी विशेषताओं का भी वर्णन करें।

(ग) भारत के मानचित्र पर भूकंप प्रभावित क्षेत्रों को अलग-अलग रंगों में दर्शाएं और कक्षा में प्रदर्शित करें। मानचित्र में भूकंप प्रभावित क्षेत्रों को घेर दिखाएं।

Other Chapter Solutions
Chapter 1 Solutions – पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक
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Chapter 3 Solutions – आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ
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Chapter 6 Solutions – हमारा पर्यावरण
Chapter 7 Solutions – जीवन का आधार : पर्यावरण
Chapter 8 Solutions – मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : लहाख प्रदेश में जन-जीवन
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Chapter 10 Solutions – मानव पर्यावरण अंतःक्रिया : अपना प्रदेश बिहार
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